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नारीत्व और नारीवाद

October 28, 2020

बारहवीं क्लास में पहुंचने के पहले ही मेरी बहने, बढ़िया खाना बना लेती थी। रोटियाँ एकदम गोल, आप चाहे तो गोलंबर से नाप सकते थे। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई के साथ क्रोसिया का काम भी उन्होंने खेल-खेल में सिद्धस्त कर लिया था। अपना सलवार सूट सिलने के साथ-साथ मम्मी की साड़ी में फाल लगाना, पापा और मेरी कमीज-पैंट की छोटी-मोटी मरम्मत, बैग की स्लिप हुई चेन पर मोम घसकर या दांत से उसकी क्लिप दबाकर ठीक कर देना, उनके लिए आम बात थी। तीज-त्योहार के मौके पर मम्मी की परंपरागत पाक कला को धत्ता बतलाकर अपने आधुनिक प्रयोगों से सबकी वाह-वाही जीत लेना। घर के लगभग सारे काम-काज, साफ-सफाई, हिसाब-किताब से लेकर पड़ोसियों तक घरेलू सामान का आदान-प्रदान, सुनियोजन किशोरावस्था को पार करने के पहले ही इन्होंने बखूबी अंजाम देना शुरू कर दिया था। यह मज़बूरी नही थी। यह संस्कार थे। ऐसा नही इन कामों को करने के लिए इन्हें डाँट-फटकार नही सुननी पड़ती थी। लेकिन यहां कौन है जिसने स्कूल में सबक सीखते समय अध्यापकों की अमृतवाणी का स्वाद नही चखा है। तो घर पे इतना कुछ सीखते समय थोड़ी- बहुत कहा-सुनी को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। पहली गुरु माँ होती है और पहला बॉस पिता।

मुझे साफ याद है कि ट्यूशन वाले मास्टर जी और आस-पड़ोस के पढ़े-लिखे लोग जो यदा-कदा घर में अवतरित होते थे, उनहोंने कभी भी मेरी पढ़ाई-लिखाई को लेकर प्रशंसा नहीं की। जहां मेरी हैंड-राइटिंग को मच्छर की टाँग सरीखा देखा जाता था वहीं दीदी के कलम से उनके हिसाब से मोती उगले जा रहे थे। ईर्ष्या होना स्वाभाविक है।  मेरा बचपन इससे अछूता नही था लेकिन बड़े होने पे वही ईर्ष्या कौतूहल और फिर सम्मान में बदल गई। वास्तव में दीदी की लिखावट पन्नों पर नक्काशी की तरह दिखती थी।

हालाँकि बारहवीं तक पहुंचते-पहुंचते रोटियाँ मैं भी गोल बना लेता था। पर उनके फूलने, न फूलने पर मेरा कोई नियंत्रण न था। इस कला में निपुणता पाने में करीब 5 वर्ष और लगे। मैं चोटियों को पाक कला के पैमाने की तरह तरह देखता हूँ। वस्तुतः अगर आपको रोटियाँ बनानी आती है और दाल, सब्जी में नमक का अंदाज़ा है तो आप सम्मान के हकदार है। आपने एक ऐसा हुनर सीख लिया है जिसके पीछे सैकड़ो वर्षो का इतिहास है। आज के दौर में अनगिनत ऐसे युवा मिल जाएंगे जिनको चावल में कितना पानी डालना है तनाव का कारण जान पड़ता है। पढ़ी-लिखी आधुनिक युवतियां इसे क्यूट कहती और समझती है। इससे पहले की सारा नारी समाज मुझ पर टूट पड़े मैं साफ कर दूं मेरा इशारा बस उन तक सीमित है जिनसे मेरा परिचय है। और जिनको मैंने ऐसा कहते देखा सुना है।

पुनः रुख अपनी बहनों की तरफ करता हूँ। मैं बहुत छोटा था जब मेरी बड़ी दीदी मुझे रात को दो बजे आटे के रसगुल्ले बनाकर खिलाती थी ताकि मैं चुपचाप सो जाऊँ। त्याग और स्नेह वह सीमेंट है जिससे परिवार सुदृढ़ता से आपस में जुड़ा होता है। और ये दोनों ही एक नारी की जन्म जात विशेषतायें कही जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। जिस सहिष्णुता और धैर्य के साथ मैंने अपनी ही नही बल्कि कई माताओं और बहनों को समस्याओं के साथ मुस्कुराते हुए जूँझते देखा है वो सिर्फ क़ाबिले तारीफ ही नही अपितु पूजनीय है। कुछ सोच कर ही स्त्रियों को हमारी हज़ारों वर्षो पुरानी संस्कृति में देवी का दर्जा दिया गया है।

दुःख तब होता है जब आज महिला सशक्तिकरण के तथाकथित फार्मूले पे अपनी और अपने जैसी उन बहनों, माताओं और मित्रों को फिट बैठते नही देखता। ये बड़ी लाल बिंदी, चौड़ी पार वाली आर्गेनिक साड़ी पहने नकली बुद्धिजीवी वर्ग को, नारीत्व के नाम पर पश्चात्य ढोंग से भरी मनगढ़ंत बे-सिर-पैर की विचारधारा से युवा पीढ़ी की मानसिकता दूषित करते देखता हूँ तो और भी दुःख होता है।

मैं इस बात का समर्थन बिल्कुल नही करता कि दशकों से जो चलता आ रहा है वो सब सही है और नई हर चीज़ गलत है। बदलाव प्रगति की प्राथमिक शर्त है लेकिन क्या बदलना चाहिए यह किसी खास वर्ग की निज़ी सहूलियत की तर्ज़ पर निर्धारित नही होना चाहिए। लड़कियों का घर से बाहर निकलना, लड़को के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना, नौकरी करना, मौलिक अधिकारों में बराबर का हक मिलना, सामाजिक सम्मान का उतना ही हकदार होना जितना कि कोई पुरुष है। अगर नैतिक मूल्यों पर अधिकारो की बात करें तो व्यख्यान बहुत लंबा हो जाएगा। मूल रूप से मेरा कहना है की समान अधिकार होने चाहिए। यह दोनों वर्गो, महिला और पुरुष की जिम्मेदारी है कि दोनों ही अपने कार्यछेत्र में समर्पण का भाव रखे पर साथ ही समाज की बुनियादी इकाई जिसे हम परिवार कहते है कि ज़रूरतों और इसके प्रति कर्तव्यों को नज़रअंदाज़ न करे।

ये लाल बिंदी वाली औरते और स्वछंद विचारधारी पुरुष जो "फेमिनिज्म" के उलटे-पुल्टे मतलब निकालकर यहां वहां सोशल मीडिया पर बिखेरते रहते है वो कभी आपके बच्चों के लिए खाना बनाने नही आएंगे न ही आपके कपड़े धोने या घर की साफ-सफाई करने। ये बस अपनी नेतागिरी झाड़ने और अपना उल्लू सीधा करने के लिए परिवारों में फूट डालेंगे। फुट डालो और राज करो कि नीति ट्राइड-एंड-टेस्टेड है। अगर वो फूट डालने में कामयाब हो गए तो राज करना कोई बड़ी बात नही। इतिहास गवाह है इस कूटनैतिक पद्धति में नुकसान हमेशा सम्मिलित इकाइयों को ही हुआ है और फुट डालने वालों का फायदा। ज़रूरत है सजग रहने की, ऐसी घटिया सोच का विरोध करने की, समझदारी के साथ नए परिवर्तनों को अपनाने की और साथ ही दकियानूसी विचाधाराओं (जिनका शायद भूतकाल में तार्किक महत्व रहा होगा पर अब वर्त्तमान में अपभ्रंश होकर केवल ढोंग रह गया है) का त्याग करने की।

"फेमिनिस्म" शब्द को जितना गलत समझा गया उससे भी ज्यादा इसको गलत समझाया गया। मेरा कहना है कि क्या सिर्फ आधुनिक महिलाएं जो हर बात में बिना सोचे समझे पुरुषों की बराबरी करना चाहती है। चाहे पुरुष गलत ही क्यों न कर रहा हो, ही अपने आपको सशक्त महिला के रूप में देखती है। सिगरेट पीना, शराब पीना, देर रात सड़को पर तमाशा करना किसी भी लिंग या वर्ग के लिए सराहनीय नही है। और जो गलत है सबके लिए गलत है। चाहे वो लड़का हो या लड़की, हर इंसान जिसका पेट है, भूख लगती है, उसको कम से कम साधारण खाना बनाना आना चाहिए। यह उसी तरह से है जैसे आप सुबह उठकर दांत साफ करते है, बाल सवाँरते है, और अन्य दैनिक क्रियाएं करते है। इसमें लज्जा जैसी कोई बात नही अपितु गर्व होना चाहिए। इसका किसी लिंग विशेष से कोई लेना-देना नही।

फिर लोग पूछेंगे की घर का काम-काज स्त्रियों के हिस्से में कैसे आया। अगर आप पारिवारिक अलगाववादी विचारधारा जहां स्वछंदता के नाम पर एकांकी प्रयोजन को समूह के सम्मिलित रुचि के आगे रखे जाने की वकालत की जाती है के दायरे से बाहर निकलकर देखेंगे तो बिल्कुल ही स्पस्ट है। स्त्रियों को कुदरत ने ऐसी नियामत दी है जिसकी बराबरी पुरुष कुदरती तौर पे चाहकर भी नही कर सकते। वो है शिशु को गर्भ में धारण करने की और जन्म देने की।

जब शुरुआती सभ्य समाज का गठन हुआ तब पारिवारिक श्रमविभाजन निर्धारित करते समय काबिलियत, कुदरती छम्यता और सहूलियत इन सभी बातों का खयाल रखा गया होगा। अपितु यह व्यस्था शायद कोई सोचा-समझा निर्णय न होकर कालांतर में स्वाभाविक रूप से फलीभूत हुआ प्राकृतिक चुनाव होगा। इस व्यस्था को प्रारंभिक पुरुष वर्ग ने समाज और परिवार पर ज़बरदस्ती थोपा नही था।

जहां औरतों का गर्भावस्था और जन्मोपरांत शिशु के साथ रहकर उसका अपने दूध से लालन-पालन करना अनिवार्य ही नहीं बल्कि प्राकृतिक मर्यादा थी वहीं पुरुष भी अपना और अपने परिवार के लिए खाना जुटाने हेतु बाहरी कार्यों के लिए बाध्य था। समय से साथ दोनों वर्ग अपने-अपने कार्यों में कुशल से कुशलतम होते चले गए। जहाँ पुरुषों ने शिकार करने के लिए मजबूत मांसल शरीर और अचूक निशाना विकसित किया वहीं महिलाओं ने खाद्यान्न परिरछन और वस्त्र निर्माण कलाओं में निपुणता प्राप्त की। बच्चे जब बड़े हुए तो लड़को को पिता के साथ शिकार के गुण सीखने जाना होता था और लड़कियो को घर के काम-काज में माँ का हाथ बटाना होता था। यह सहजीविता कहलाती है शोषण नहीं। इस व्यवस्था के लिए किसी भी एक वर्ग को दोषी ठहराना गलत है।

कालांतर में समाज की बनावट बदली और जीविकोपार्जन तुलनात्मक रूप से ज्यादा सुलभ हो गया। या कहे तो शारीरिक श्रम और अनियतता कम हो गयी। खासकर से शहरों में जहां रोजगार के विभिन्न माध्यम उपलब्ध है ये ज्यादा स्पस्ट समझा जा सकता है। रोजगार की प्रकृति भी ऐसी है जो महिलाएं एवम पुरुषों को समान अवसर प्रदान करती है। इतना ही नही ऐसे संसाधन भी उपलब्ध होते है कि नाभिकीय परिवार भी सहजतापूर्वक अपने परिवार के छोटे सदस्यों के भरण-पोषण के साथ अपना पेशा भी जारी रख सकते है। किन्तु गाँव का समाज आज भी पुराने श्रम विभाजन के आधार पर टिका हुआ है और आदर्श हालातों में फल-फूल भी रहा है। इस सत्य से आंख नही मूंदना चाहिए।

काफी समय तक एक प्रचलित अवधारणा के अंतर्गत ऐसा भी माना जाता रहा था की अंग्रेज़ो के आगमन से पहले भारत एक अल्हड़, फूहड़, अव्यावस्थित समाज था जहां सिर्फ पाखंड था। उच्य वर्गो/वर्णो के द्वारा निन्म का शोषण होता था। ये बात आंशिक रूप से सही भी थी लेकिन इसे साधारण मानकर हमारी सभ्यता-संस्कृति का मजाक बनाया गया। पुरानी कहावत है "गेंहू के साथ घुन भी पिसता है"। लेकिन इस पिसाई में घुन के साथ गेहूं पीस गया। बेबुनियादी तर्ज़ पे अंग्रेज़ो ने अपना किरदार व्यपारियों से बदलकर शासकों में परिवर्तित कर लिया और पूरे भारत को गुलाम बनाकर हमें जीने के पाश्चात्य नुस्खे सिखाने के नाम पर लूटते रहे। हम आपस में लड़ते रहे वो अपना काम करते रहे।

अगर आंखे खोलकर ध्यान से देखें तो यही पैटर्न साफ दिखेगा जब फर्जी आध्यात्म का दंभ भरने वाले किसी भी तरह से लोकप्रिय श्रेणी में खड़े कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए समस्त नारी वर्ग के विचारों में ज़हर घोलने का काम करते है। "नारीवाद" के नाम पर उन महिलाओं को उकसाया जाता है जिनका इनको लेश मात्र भी अंदाज़ा नहीं है।

वातानुकूलित आवास, होटलों, वाहनों में सफर करने वाले ये लोग त्याग, बलिदान की मूर्ति, सहिष्णुता की पराकाष्ठा और नारी के नारीत्व के आदर्शो का निर्धारण करने के योग्य नहीं। बस इतना कहना चाहता हूँ। हर बेटी, पत्नी, माँ को पूरा अधिकार है कि वो नारीत्व की कैसी परिभाषा दुनिया के सामने रखना चाहती है। इसी को मैं "फेमिनिज्म/नारीवाद" समझता हूँ।

फर्जी बुद्दिजीवी वर्ग और नारीत्व के झूठे ठेकेदारों को सूचित हो कि आँकलन करने के लिए आप स्वतंत्र है लेकिन चरित्र निर्धारण करना आप का काम नही। मेरी बहने भी उतनी ही सशक्त है जितनी की कोई अभिनेत्री, डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी में कार्यरत कोई और महिला। मुझे हर उस माँ पर जिसने अपनी व्यतिगत आकांक्षाओं में कटौती कर परिवार को ज्यादा महत्व दिया, उतना ही गर्व है जितना कि उस महिला पे है जिसने अपने पेशेवर कार्यछेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त की। हम सबने नारीत्व देखा है अहसास किया है यकीन मानिए आज के दौर में हमें नारीवाद जैसे मृगमरीचिका की ज़रूरत नहीं। एक दूसरे में विश्वास और प्रेम की ज़रूरत है।

Author:
Rajeev Kumar, Assistant Professor, School of Communiation Design, Unitedworld Institute of Design (UID)

Disclaimer: The opinions / views expressed in this article are solely of the author in his / her individual capacity. They do not purport to reflect the opinions and/or views of the College and/or University or its members.

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